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Baadal Baarish aur ziandagi..

बादलो के नीचे..
बारिशो के बीच..
कुछ ख्वाब थे पले..
पर ज़िन्दगी कुछ दूर..
बस थोड़ी दूर.. है चले...

काले थे बादल..
घिरा था आसमान..
ख्वाब थे अनगिनत..
भरा था अभिमान..

खुला है मौसम..
दूर तक दीखता है सब...
बारिश जो होती है अब..
याद आता है सब..
पाँव पड़े है ज़मीन पे..
और उड़ते थे तब..

पंख तो आज भी है..
फैलाना नहीं चाहते..
प्यार जिनसे करते है..
उनको सहमाना नहीं चाहते..

वो बादल आज भी..
कुछ खवाबो को पालते होंगे..
वो बारिश आज भी..
कुछ अरमान भिगाती होगी..
कुछ साल में ज़िन्दगी फिर ज़मीन पे आती होगी..
और फिर पंख फैला के उड़ जाती होगी...

ज्यादा मत सोचो.. मुझे भी नहीं पता मैं ऊपर क्या लिखा क्या नहीं... बस मन किया और लिख दिया... :)

-उदित

TIME Saved or Spent??

OK. So back to the most enigmatic entity for me - TIME.

So, all our life we keep on battling to save this TIME.
- Some want to save this TIME to spend it with his/her family.
- Some want to save this TIME so that they can watch the God Damn Cricket Match.
- Some want to save this TIME to spent some more of it on making more fortune.
- After all TIME is money, everybody wants to save it - obvious.

In the quest of saving TIME, man invented various machines. Now, we have a machine for everything. Starting from needle to a satellite in space everything is machine, all intrinsically designed and developed to save TIME for mankind.

I just so feel that we CAN NOT SAVE TIME, at the very max we can just use the TIME right now that we would have had in future. TIME has its own time and you just cant save it or spend it on your own will.

Did not understand what I just said? Well me too!. But here is what my thinking is:
If we have to travel on foot, without any machine from Delhi to London it mi…

Muskaati aankhen...

बड़ी बड़ी वो आँखें उनकी..
मुस्काती मटकाती ...
काली काली वोह आँखें उनकी...
झुक झुक के शर्माती...


कभी झपक के ..
कभी मचक के..
सब कुछ वो कह जाती...
प्यार भी उनका...
उनका गुस्सा... सब मुझको दिखालती...


घूर घूर के कभी डराती..
कभी.. सिमट के बस हंस जाती...
बड़ी बड़ी वो आँखें उनकी...
मुस्काती मटकाती...


आँखों से बातें..
और आँखों में रातें...
सब मुझको दिखलाती...
गहरी गहरी सागर सी...
नित नए फूल खिलाती ..


कभी  आइना  बन जाती ..
तो कभी तस्वीर दिखलाती ...
बड़ी बड़ी वोह आखें उनकी...
मुस्काती मटकाती ...


पायल की छन छन ...
घुंघरू की घन घन...
न जाने कैसे कैसे साज़ बजाती...
कभी  नाचती  ... इठलाती .. और  
कभी धीमे से लजा जाती ...


bus yun hi..

कभी कभी तन्हाइया  भी बहुत कुछ कह जाती है... 
कभी शोर भी चुप रह जाता है... 
हम चाह कर भी कुछ कह नहीं पाते... 
और वक़्त बस यूँ ही सरकता जाता है...


कभी कुछ dhundte रहते है हम कही..
कभी कुछ और ही मिल जाता है..
अभी न समझे हम कीमत जिसकी..
यह सरकता वक़्त समझा जाता है..


बस कभी देर सी हो जाती है ..
कभी हम जल्दी ही चाहते हैं...
जीवन की आपा धापी में...
हम कुछ खुशिया खोते जाते हैं...


यह वक़्त सरकता जाता है...
और हम कही पीछे रह जाते है...
आगे बढ़ना चाहे भी तो ...
कभी धक्का सा लग्ग जाता है...


कभी मन का बच्चा जागता है..
कभी बूढ़ा सा हो जाता है...
उछल कूद करता है कभी...
कभी लाठी ले के चलता है...



चाहो तो खुश हो लो... चाहे रोलो धोलो...
पर यह वक़्त यूँही बस यूँही सरकता जाता है...


उदित.